हमारा जीवन श्रीपाल व मयणासुन्दरी की तरह हो: साध्वी सुरंजनाश्री

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बाड़मेर।

श्रीपाल राजा सहित 700 राजाओं के कुष्ठ रोग निवारण के लिए उनकी पत्नी मैना सुंदरी ने धर्म की जिस दृढ़ता के साथ आराधना की उसी से उनके पति का कुष्ठ रोग का निवारण हुआ। वर्तमान में इतना समर्पण भक्तों में देखने नहीं मिलता। न तो ऐसे राजा श्रीपाल अब है, और न ही मैना, लेकिन धर्म के प्रति समर्पण के साथ आयोजन किए जाए तो निश्चित रुप से पुरुषों पर आने वाली कर्म निर्जरा का क्षय मैना सुंदरी कर सकती है।

यह बात जैन साध्वी सुरंजनाश्री महाराज ने स्थानीय जैन न्याति नोहरा नवपद ओलीजी प्रवचनमाला के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित कर कही। नवपद ओली का द्वित्तीय दिवस, सिद्ध भगवन की आराधना की गई। श्री नवपद शाश्वती ओली आराधना द्वित्तीय दिवस सिद्ध प्रभु की आराधना सिद्ध की आराधना को प्राणवंती बनाने के लिए आत्मा 8 अष्ट कर्मों से मुक्त होने पर सिद्ध बनती है ज्ञानावरणीय कर्म, दर्शनावरणीय कर्म, वेदनीय कर्म, मोहनीय कर्म, आयुष्य कर्म, नाम कर्म, गौ़कर्म, वीर्यान्तराय कर्म के क्षय से। जो आत्मा अनंतकाल तक ज्ञान-दर्शन-चारित्र में रमण करती है, आहार संज्ञा से मुक्त होती है। सिद्ध बनने वाला किसी का साथ नही चाहता है, वह तो निर्भीक होकर अपने गंतव्य स्थल की ओर बिना रुके कदम बढ़ाते रहता है।

साध्वी श्री ने कहा कि राजा महिपाल ने मैनासुन्दरी को जैन साध्वी के पास अध्ययन करने को भेजा तथा बड़ी पुत्री सुर सुन्दरी को अन्य गुरु के पास भेज दिया। दोनों पुत्रियाँ पढ़कर घर पहुँची। एक दिन राजा ने पुत्रियों को वर पसन्द करने के लिए कहा सुरसुन्दरी ने अपनी पसन्दगी का वर बतला दिया। मैना सुन्दरी ने कहा- पिता जी, उच्चपद, संयोग-वियोग भाग्य के अनुसार मिलते हैं। उन्हें खोजने की आवश्यकता ही कहाँ है? यह सुनकर राजा मैना से चिढ़ गया। राजा का विश्वास था कि मेरा किया हुआ सब कुछ होता है। उसने भंयकर कुष्ट रोग से ग्रसित श्रीपाल के साथ मैना का विवाह कर दिया, किन्तु मैना के भाग्य से वही कोढ़ी श्रीपाल भी वैभव सम्पन्न राजा बन गया।

खरतरगच्छ चातुर्मास समिति के मिडिया प्रभारी चन्द्रप्रकाश बी. छाजेड़ ने बताया कि नवपद ओलीजी आराधना के दौरान सकल विश्व में शांति व समृद्धि की कामना के लिए त्रिदिवसीय शांति स्नात्र महोत्सव का आयोजन किया जायेगा जिसमें शहर के सकल जैन समाज के सहयोग से इस अनुष्ठान का आयोजन किया जायेगा। आराधना भवन मंदिर के पूजारी गोविन्दसिंह राजपुरोहित व आयम्बिल तप तपस्वियों का खाना बनाने वाले टीकमराम ने जैन धर्म के नवपद ओलीजी की आराधना से प्रभावित होकर एक दिन का आयम्बिल तप किया।

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