वाणी एक अनमोल संपदा- प.पू. मनितप्रभसागरजी म.सा.

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बाड़मेर

कुशल कान्ति-मणि प्रवचन वाटिका, सुखसागर नगर कोटडिया-नाहटा ग्राउण्ड में परम् पूज्य आचार्य भगवन्त मणिप्रभसूरिश्वरजी म.सा. के विद्वान शिष्य रत्न मोकलसर नन्दन मुनिराज मनितप्रभसागरजी म.सा. एक बड़ी संख्या में उपस्थित जन समूह को संबोधित करते हुए कहा- जीवन को सच्चे अर्थों में जीवंत बनाने के लिए सद्व्यवहार का गुण होना आवश्यक है परंतु हमारे सद्व््यवहार के गुण को प्रकट करने के लिए एक और महत्वपूर्ण गुण है। वह गुण है- हमारे शब्द, हमारी वाणी, हमारे वचन। एक मेरू जो काम माला में करता है वैसा ही कार्य हमारी वाणी सद्व्यवहार को अच्छा दिखाने के लिए करती है। वाणी मिलना सामान्य बात नहीं। वाणी तो बहुत पुण्य से मिलती है। चैरेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों को ही वाणी मिलती है। एकेन्द्रिय, बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय जैसे जीव में वाणी का अभाव होता है। वाणी एक अनमोल संपदा है इसका उपयोग टैलीग्राम की तरह करे। जितना जरूरी हो उतना ही बोलो, अनावश्यक अपनी वचन लब्धि को समाप्त न करे।

हमारे शास्त्रों में समिति और गुप्ती का वर्णन आता है। जिसमें भाषा समिति अर्थात कम बोलना और मनोगुप्ती अर्थात मौन रहना बताया गया है। हमें इन सिद्धांतों को अपने जीवन में आत्मसात् करना है। व्यवहार प्रबंधन का एक ही भाग है- भाषा प्रबंधन। घोड़े की लगाम थामना एकदफा सरल है परंतु शब्दों की लगाम थामना अत्यंत दुष्कर है। शब्द तो हमारे जीवन के अलंकार है। सोना-चांदी इत्यादि अलंकार न होंगे तो चल जाएगा परंतु शब्दों के अलंकार जिसके पास नहीं है वह जहां भी जाएगा निश्चित ही अपमान और तिरस्कार के सिवाय कुछ नहीं पायेगा। मात्र शब्द ही तो थे जिन्हें बोलते समय द्रोपदी ने विवेक न रखा और दुर्योधन से कहा गया एक छोटा सा वाक्य- ‘अंधे का बेटा अंधा‘ जिससे विनाशकारी महाभारत की रचना हो गई। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी वाणी को वीणा बनाएं।

हमारे मुख से निकले गए शब्द, रत्नों की दुकान है। जब उचित ग्राहक मिले तो इस दुकान के शटर को खोल दो अन्यथा इसे बंद ही रहने दो। हमारे शरीर में हमें कई इंद्रियां (नाक,कान, हाथ, पांव) 2-2 मिली परंतु जीभ सिर्फ एक मिली। कान दो है जो हमे सिखाता है, सुनो ज्यादा। हमारी जीभ एक है परंतु उसके कार्य दो है- खाना और बोलना। जरूरत से ज्यादा खाने पर पेट बिगड़ता है और आवश्यकता से अधिक बोलने से संबंध भी बिगड़ते हैं। इसलिए आदत डालें- प्रिय बोलने की, समान भाषा में बोलने की, अल्प बोलने की, भाषा को तोल-तो़लकर कर बोलने की और मौन रहने की। ज्ञानी कहते हैं कि- जीभ पर लगा गया घांव जल्दी भरता है परंतु जीभ द्वारा लगे गए घावों को भरने में तो पूरी जिंदगी चली जाती है। समझदार लोग पहले सोचते हैं फिर बोलते हैं और मूर्ख लोग पहले बोलते हैं फिर सोचते हैं इसलिए बोलो उससे पूर्व सोचो कि मैं जो बोल रहा हूं वह हितकर है अथवा नहीं। जीवन में मितव्ययी बनो- जहाँ वाक्य की जरूरत हो वहां वाक्य बोलो, जहां एक शब्द की जरूरत हो वहां एक शब्द भी बोलो और जहां मौन रहने से काम चल जाता है वहां मौन रहों।

पूज्य गुरु भगवंत ने वाणी के अनेक प्रकारों को समझाते हुए कहा- मृषा अर्थात झूठ न बोलें, किसी को आघात पहुंचे ऐसी वाणी न बोले, अनावश्यक न बोले, कठोर भाषा का इस्तेमाल न करें और मूर्खतापूर्ण हर क्षेत्र में बड़-बड़ न करें। अपनी वाणी को कटर नहीं बैटर बनाएँ, कैंची नहीं फेवीकोल बनाएँ, नमक नहीं शक्कर बनाएँ। प्रिय बोले, मधुर बोले और मीठा बोले।

स्वर्णिम चातुर्मास 2018 के कोषाध्यक्ष भंवरलाल सेठिया व संघ के ट्रस्टी प्रकाष बरड़िया ने बताया कि पाष्र्व कुषल जैन संघ, त्रिपुर के अध्यक्ष रतनलाल बोथरा का संघ द्वारा अभिनन्दन किया गया। शनिवार को जिज्ञासा-समाधान विषय पर प.पू. मनितप्रभसागरजी म.सा. का विषेष प्रवचन होगा। 5 अगस्त, रविवार से चिन्तामणि तप की तपस्या का शुभारम्भ होगा एवं प्रवचन में फ्रेंडषिप डेः कैसे मनाये व दोपहर में पूणिया सामायिक आराधना का कार्यक्रम होगा।

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