गद्दीनशीन होने के बाद पहली बार बाड़मेर पहुंची सुदीक्षा

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बाड़मेर।

निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज के पावन सानिध्य में जिले के आदर्श स्टेडियम में मंगलवार सांय 4 बजे से रात्रि 8 बजे तक विशाल आध्यात्मिक निरंकारी संत समागम का आयोजन किया गया।

निरंकारी मण्डल ब्रांच बाड़मेर के मीडिया सहायक हितेश तंवर ने बताया कि ’संत समागम हरि कथा, तुलसी दुर्लभ दोय’ की भावना के साथ बाड़मेर सहित जयपुर, हनुमानगढ़, अलवर, धोरीमन्ना, कवास, उतरलाई, भीलों का पार, बालोतरा, पचपदरा, बायतु, रामसर तथा राजस्थान के कई जिलों व राज्यों से हजारों निरंकारी अनुयायियों ने श्रद्धापूर्वक उपस्थित होकर सतगुरु के आलौकिक पावन दिव्य दर्शनों का आनन्द प्राप्त किया।

सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज के पण्डाल में प्रवेश करने पर ’सतगुरु माता सुदीक्षा सविंदर हरदेवसिंह महाराज की जय’ के जयकारों तथा ’प्यार से बोलिये धन निरंकार जी’ की वाणी से पूरा आकाश गुंजायमान हो गया तथा सपना, भावना, सुशीला, सुमन, पूजा द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया। समागम में कई श्रद्धालुओं ने विचारों, भजनों एवं नृत्य द्वारा आशीर्वाद प्रदान किया।

इस दौरान साध-संगत को आशिवर्चन प्रदान करते हुए सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज ने कहा कि, दासी जब दिल्ली से रवाना हुई तो हरियाणा होते हुए राजस्थान के सूरतगढ़, बीकानेर, जैसलमेर तथा अभी बाड़मेर में आयी हुं। जब दासी ने राजस्थान में प्रवेश किया तथा राजस्थान में ज्यादातर लोग पगड़ी बांधे हुए ही देखे तथा राजस्थान के लोगो की पगड़ी, वेशभूषा से पता लग जाता हैं, कि ये राजस्थानी लोग है। हमारा मनुष्य शरीर भी इसी तरह का हैं। सभी के अंदर एक ही आत्मा है पर हम इस संसार के किसी भी कोने में रहते हैं हम वहां की संस्कृति को अपना लेते हैं ओर धीरे-धीरे हमारी आत्मा को भी ये भ्रम होने लग जाता हैं, कि ये शरीर भी हमारा असली असितत्व हैं। हमारी आत्मा इस परमपिता परमात्मा का ही अंश है, ओर वो परमपिता परमात्मा एक ही हैं। हम सब इस एक के अंदर से ही आये हैं वापस भी इसके अंदर ही समा जाना है। सतयुग से ही संत महात्मा एक ही बात समझाते आ रहे कि अगर हम मनुष्य के शरीर में इस पृथ्वी पर आए हैं तो हम मनुष्य बन जाये। प्रेम की वाणी, विशालता, नफरत नही करना तथा संकीर्णताओं से ऊपर उठकर ही हम असली मनुष्य बन पाएंगे। धर्म-ग्रन्थ, वेद-कुरान पढ़ना तो मुबारख है पर इस इसमें क्या लिखा है वो अगर हम जान ले तो हमारा ये जीवन सुधर जाता हैं। आज ये निरंकारी मिशन भी इस परमात्मा का ज्ञान कराता हैं। कबीरदास भी धर्म-ग्रन्थ पढ़ते थे लेकिन उनके जीवन में सतगुरु रूप में रामानन्दजी आकर उन्हें ऐसी आंख दे दी तथा जिससे उन्हें सब समझ मे आ गया। उनके जीवन में अगर सतगुरु नही आता तो उनका जीवन भी इस रोशन मीनार वाला नही बन पाता।

मनुष्य को भी अपने अंदर एक बार देख लेना चाहिए कहीं हमारा भी जीवन वैसा तो नही हैं कि किसी इंसान से नफरत करना, किसी का खान-पान पंसन्द नही करना या फिर किसी के पहनावे को अच्छा नही समझना। शरीर पर नया वस्त्र डालने से कुछ नही होता हैं जब हम आत्मा में इस परमपिता का असली रूप जान लेंगे तो हम रोशन मीनार बन पाएंगे तथा हमे ओरो को भी रोशन मीनार बनाना होता हैं। चिकित्सालय में भी डॉक्टर की बात मानने से ही हमारा शरीर ठीक हो पाता हैं इसी तरह इस परमात्मा को जानने तथा इसकी बात को मानने से ही हमारा जीवन इस भव सागर से पार हो सकता हैं। जो हो गया हैं उसे भूल कर भी अगर हम इस परमात्मा को जान लेंगे तथा इसके अनुसार जीवन यापित करे तो भी हम इस संसार मे जाने जा सकते हैं। सत्संग में आने से ही हम हमारे जीवन मे बदलाव ला सकते हैं तथा फिर किसी इंसान से बात करने पर भी उसे अच्छा लगेगा।

निरंकारी सत्संग में सत्य का ज्ञान कराया जाता यहां पर किसी भी तरह का भेवभाव नही होता हैं सभी को एक समान समझा जाता हैं ओर हमें भी ओरों को इस सत्य का ज्ञान करवाना चाहिए। निरंकारी मिशन की गुरु गद्दी पर आसीन होने के बाद सतगुरु माता सुदीक्षा महाराज के पहली बार बाड़मेर आगमन पर जिले सहित सैकड़ों गांवों के श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिला तथा समागम में श्रद्धा, भक्ति व प्रेम का आलौकिक दृश्य जीवंत हुआ। श्रद्धालुओं के हाव भाव से लग रहा था कि, गुरु दर्शनों से ’’मन का मयूर नाच उठा तथा खिल उठी आत्मा’’। समागम की कमान निरंकारी सेवादलो एवं साध-संगत ने पूरे दिन सम्भाले रखी तथा सतगुरु माता सुदीक्षा जेड प्लस-प्लस सुरक्षा में रही।

समागम स्थल पर लंगर, केंटीन, प्रकाशन, प्रेस एवं पब्लिसिटी कार्यालय, स्वागत कक्ष, डिस्पेंसरी की सुविधा भी उपलब्ध करवाई गई। समागम स्थल पर स्थापित ज्ञान कक्ष में प्रभु प्रेमी, जिज्ञासु सज्जनों ने सतगुरु की शरण मे आकर निरंकार परमात्मा की जानकारी प्राप्त की। संत समागम में आये सेवादारों तथा श्रद्धालुओं को समागम स्थल पर सद्गुरु माता के पावन श्रीचरणों में नमस्कार करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समागम के सफल आयोजन में स्थानीय संयोजक शांतिलाल, विनोद कुमार, मुकेश नागौरा के नेतृत्व में सेवादलो व साध-संगत ने समागम की व्यवस्थाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

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